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“लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई” —- डॉ जय शुक्ला

इतिहास स्वयंको दोहराता है। पहले 1971 मेँ श्रीमती इंदिरा गाँधी के सामने बाँगलादेश बनने के समय; फिर 1975 मेँ वियतनाम; फिर 2026 मेँ ईरान। यह पुनः सिद्ध हुआ कि किसी परमाणु शक्ति सम्पन्न महाशक्ति को हरानेके लिये उसके बराबर संसाधनोँकी नहीँ, बल्कि अपने पास रीढ़की हड्डी, गहरी देशभक्ति, और दृढ़ नीयत की आवश्यकता होतीहै।

    यह 117वीँ बार ट्रम्प ने यू-टर्न लिया; 7 अप्रैल, 2026 की रात्रिमेँ 9 बजे “एक बड़ी सभ्यता दुनियाँ से मिट जायेगी”; मात्र 11 बजे युद्धविराम। ट्रम्प ने ईरान की सभी दस शर्तेँ मान लीँ, ईरान ने होर्मुज़ का रास्ता खोल दिया। यह दस शर्तेँ हैँः-

1) अमेरिका हमला नहींकरेगा (Non-aggression)।

2) Strait of Hormuz पर ईरानका कंट्रोल बनारहेगा।

3) यूरेनियम enrichment कोमंज़ूरी।

4) सभी primary sanctions हटाए जाएंगे।

5) सभी secondary sanctions भी खत्महोंगे।

6) United Nations Security Council के सभी प्रस्ताव खत्मकिए जाएंगे।

7) अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी के बोर्ड औफ़ डाइरेक्चर्स के सभी प्रस्ताव खत्मकिए जाएंगे।

8) ईरानको मुआवज़ा दिया जाएगा।

9) इलाकेसे अमेरिकी फौज हटेगी।

The 10) हरमोर्चे पर जंग बंदहोगी, जिसमें हिज़बुल्ला (पाकिस्तान लेबनान की इस्लामिक रेजिस्टेंस) केखिलाफ कार्रवाईभी शामिल है।

फ़िलहाल यह युद्धविराम दो सप्ताह के लिये है, इस्लामाबाद मेँ वार्ता के बाद पूरी स्थिति साफ़ होगी। किन्तु स्थितियाँ दूसरे प्रकार की भी बदलेँगी। अमरीका सुपरपावर के पदसे हटेगा। सुपरपावर रहने के लिये तीन शक्तियाँ आवश्यक हैँ – सैन्य और हथियारोँकी शक्ति, आर्थिक शक्ति, और अपनी शक्ति के प्रति दूसरोँ के हृदयमेँ भया। अमरीका का मिसाइलोँ का ज़ख़ीरा काफ़ी खाली हो चुका है, जबकि ईरान की 10,000 किमी वाली मिसाइल भी खड़ी होगई है। साथही दो मज़बूत ताकतेँ, चीन और रूस की एलायेंस ईरान के पासहै। डॉलर के आगे अपनी करेंसी मज़बूत करनेके लिये चीन पहलेही व्यापार मेँ ख्ररीददारोँ से डॉलर के बदले येन मेँ पैसे लेने की शर्त रखता रहा, अब युद्ध के दौरान ईरान ने तेल बेचने के लिये येन की शर्त रख दी। तीसरी ताक़त भय की थी, तो वह तो इस 40 दिनोँ के युद्ध के बाद घट ही गई, विशेषकर जब अमरीका की केन्द्रीय सरकार डगमगाने की स्थिति में है, वहाँ 85 सीनेटर ट्रम्प को हटाने के लिये लिखकर देचुके हैँ।

कुछ भयप्रद परिस्थितियाँ भी उत्पन्न होती दीख रही हैँ। चीन की मानसिकता साम्राज्यवादी है, विशेषकर भारत इसका बहुत नुकसान उठारहा है। अब वह अपनी “दबंगई” बढ़ाएगा, और पूरे हिन्द महासागर क्षेत्र के देश चिंतित रहेंगे। किन्तु सबसे ख़तरनाक वह ज्वालामुखी है, जिसने सुलगना प्रारंभ कर दिया। उत्तरी कोरिया ने, जिसे अनेक कारणोँ से अभीतक चुप बैठना पड़ा था, दोदिन पूर्व ईरान पर अटैक की स्थिति मेँ वॉशिंगटन और तेलअवीव पर न्यूक्लियर हमलेकी खुली चेतावनी दी। अब युद्धविराम होतेही उसने अपनी मिसाइल जापान की दिशा मेँ छोड़दी।

      फ़िलहाल सन्तोष है कि पृथ्वी और मानव समाज बहुत बड़े विनाशसे अभी बच गया है। – जया शुक्ला

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