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बंगाल में अब तक सिर्फ चुनाव हुए, पर “बंगाल अस्मिता” के लिए कभी चुनाव क्यों नहीं हुआ?

कोलकाता/नई दिल्ली।

भारत का लोकतंत्र दुनिया में अपनी विशालता, विविधता और जनता की भागीदारी के लिए जाना जाता है। यहां हर वर्ष किसी न किसी राज्य में चुनावी माहौल बना रहता है। चुनाव आते ही राजनीतिक दल बड़े-बड़े वादे करते हैं, मंच सजते हैं, रैलियां होती हैं, नारों की गूंज सुनाई देती है और जनता से विकास, सुरक्षा, रोजगार और सम्मान के नाम पर वोट मांगे जाते हैं। लेकिन जब चुनाव खत्म होते हैं, तो अक्सर वही जनता अपने पुराने सवालों के साथ फिर खड़ी रह जाती है।

अगर पश्चिम बंगाल की बात करें तो यह राज्य हमेशा से राजनीति का केंद्र रहा है। यहां चुनाव सिर्फ मतदान नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संघर्ष की तरह देखे जाते हैं। कभी 34 साल तक वाम मोर्चा का शासन रहा, फिर तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता संभाली, और अब भारतीय जनता पार्टी एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर रही है। हर चुनाव में सरकार बदलने या बचाने की लड़ाई होती है, लेकिन इन सबके बीच एक सवाल लगातार अनसुना रह जाता है—क्या कभी “बंगाल अस्मिता” के लिए चुनाव हुआ?

यह सवाल आज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, बौद्धिक और क्रांतिकारी चेतना का केंद्र रहा है। जिस धरती ने देश को राष्ट्रगान देने वाले रवींद्रनाथ ठाकुर, आज़ाद हिंद फौज के संस्थापक सुभाष चंद्र बोस, “वंदे मातरम्” के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर दिए, वहां आज अस्मिता का मुद्दा राजनीति की भीड़ में कहीं दब गया है।

क्या है “बंगाल अस्मिता” का वास्तविक अर्थ?

“बंगाल अस्मिता” सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं है। यह बंगाल की पहचान, उसकी संस्कृति, उसकी भाषा, उसका साहित्य, उसकी कला, उसका इतिहास और उसका स्वाभिमान है।

बंगाल की पहचान उसकी मिट्टी से जुड़ी है। यहां की भाषा में मिठास है, यहां के साहित्य में क्रांति है, यहां के संगीत में आत्मा है और यहां की संस्कृति में परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत मेल है।

बंगाल की पहचान उसकी विश्व प्रसिद्ध दुर्गा पूजा से है, जिसे यूनेस्को ने “इंटैन्जिबल कल्चरल हेरिटेज” का दर्जा दिया। बंगाल की पहचान उसकी कला, थिएटर, फिल्मों, किताबों और बौद्धिक बहसों से रही है।

लेकिन आज सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल इस अस्मिता को बचाने के लिए लड़ रहे हैं, या सिर्फ चुनाव जीतने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं?

चुनाव में क्यों नहीं बनता “अस्मिता” मुद्दा?

पश्चिम Bengal में हर चुनाव में अलग-अलग मुद्दे उठते हैं।

कभी “खेला होबे” का नारा चलता है, कभी “परिवर्तन” की बात होती है, कभी “डबल इंजन सरकार” का वादा किया जाता है। लेकिन चुनाव के केंद्र में अक्सर धर्म, जाति, तुष्टिकरण, बाहरी बनाम भीतरी और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दे हावी हो जाते हैं।

राजनीतिक दल “अस्मिता” की बात इसलिए नहीं करते क्योंकि अस्मिता की बात करने का मतलब होगा जवाब देना—

बंगाल में उद्योग क्यों खत्म हो रहे हैं?

रोजगार के अवसर क्यों कम हो रहे हैं?

युवाओं का पलायन क्यों बढ़ रहा है?

शिक्षा व्यवस्था कमजोर क्यों हो रही है?

राजनीतिक हिंसा क्यों बढ़ रही है?

महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

बंगाल की सांस्कृतिक पहचान पर राजनीति क्यों हो रही है?

इन सवालों के जवाब देना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं है।

राजनीतिक हिंसा: बंगाल की छवि पर दाग

पश्चिम बंगाल का नाम आते ही आज राजनीति के साथ हिंसा की खबरें भी जुड़ जाती हैं।

चुनाव के दौरान बूथ कब्जाने, बमबाजी, आगजनी, मारपीट और हत्याओं की खबरें अक्सर सुर्खियों में रहती हैं। पंचायत चुनाव हो, लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव—हिंसा की घटनाएं राज्य की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं।

जिस राज्य को कभी बुद्धिजीवियों और क्रांतिकारियों की धरती कहा जाता था, वहां अगर लोकतंत्र खून-खराबे के बीच दिखाई दे, तो यह बंगाल अस्मिता पर सबसे बड़ा हमला है।

राजनीतिक हिंसा सिर्फ जान नहीं लेती, यह राज्य के सम्मान और निवेश दोनों को खत्म करती है।

बंगाल से उद्योगों का पलायन

एक समय था जब कोलकाता देश की आर्थिक राजधानी माना जाता था।

बड़े उद्योग, बंदरगाह, व्यापार और रोजगार के अवसर यहां खूब थे। लेकिन समय के साथ उद्योग धीरे-धीरे दूसरे राज्यों में चले गए।

आज कई कंपनियां गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित और लाभदायक मानती हैं।

उद्योगों के जाने का सीधा असर रोजगार पर पड़ा। लाखों युवाओं को नौकरी के लिए राज्य छोड़ना पड़ा।

जब किसी राज्य का युवा अपने सपनों को पूरा करने के लिए बाहर जाए, तो यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि अस्मिता का भी संकट है।

युवाओं का पलायन—टूटते सपनों की कहानी

आज बंगाल के हजारों छात्र और युवा बेहतर शिक्षा और नौकरी के लिए बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली और विदेशों का रुख कर रहे हैं।

यह पलायन सिर्फ अवसरों की तलाश नहीं, बल्कि राज्य की नीतियों पर सवाल है।

अगर राज्य अपने युवाओं को रोजगार, स्टार्टअप का माहौल और सुरक्षित भविष्य नहीं दे पा रहा, तो “अस्मिता” शब्द सिर्फ भाषणों में अच्छा लगता है।

संस्कृति पर राजनीति का साया

बंगाल की पहचान उसकी संस्कृति है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में संस्कृति भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गई है।

दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा, रामनवमी और अन्य त्योहारों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी बढ़ी है।

कभी पूजा समितियों को अनुदान पर राजनीति होती है, कभी जुलूसों पर सवाल उठते हैं, कभी धार्मिक ध्रुवीकरण किया जाता है।

संस्कृति जब राजनीति का हथियार बनती है, तो उसकी आत्मा कमजोर हो जाती है।

महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक सम्मान

बंगाल में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी कई बार सवाल उठे हैं।

महिलाओं के खिलाफ अपराध, छेड़छाड़, दुष्कर्म और राजनीतिक प्रताड़ना की घटनाएं सामने आती रही हैं।

अगर एक राज्य अपनी महिलाओं को सुरक्षित माहौल नहीं दे सकता, तो उसकी अस्मिता अधूरी मानी जाएगी।

महिला सम्मान भी “बंगाल अस्मिता” का बड़ा हिस्सा है।

शिक्षा और स्वास्थ्य—अस्मिता का आधार

बंगाल कभी शिक्षा का गढ़ माना जाता था।

कलकत्ता विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय और प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों ने देश को प्रतिभाएं दीं।

लेकिन आज सरकारी स्कूलों की स्थिति, शिक्षक भर्ती विवाद और शिक्षा में राजनीति के आरोप चिंता का विषय हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं में भी सरकारी अस्पतालों की स्थिति कई बार सवालों के घेरे में रहती है।

अगर शिक्षा और स्वास्थ्य कमजोर होंगे तो अस्मिता भी कमजोर होगी।

“बंगाल अस्मिता” पर चुनाव कब होगा?

असली चुनाव तब होगा जब मुद्दा होगा—

बंगाल में उद्योग वापस कैसे आएंगे?

युवाओं को रोजगार कैसे मिलेगा?

शिक्षा और स्वास्थ्य कैसे सुधरेगा?

महिलाओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?

राजनीतिक हिंसा कैसे खत्म होगी?

भ्रष्टाचार कैसे रुकेगा?

संस्कृति और विरासत कैसे बचेगी?

जिस दिन जनता इन सवालों पर वोट देगी और नेता इन सवालों पर जवाब देंगे, उस दिन कहा जा सकेगा कि बंगाल में “अस्मिता” के लिए चुनाव हो रहा है।

पश्चिम बंगाल में सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, नारे बदले, लेकिन आम जनता की कई मूल समस्याएं जस की तस बनी रहीं।

“बंगाल अस्मिता” सिर्फ एक चुनावी शब्द नहीं, बल्कि करोड़ों बंगालियों की आत्मा और सम्मान का प्रतीक है।

जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल धर्म, जाति और तुष्टिकरण की राजनीति से ऊपर उठें और बंगाल के सम्मान, रोजगार, शिक्षा, संस्कृति और विकास को असली मुद्दा बनाएं।

क्योंकि जब तक चुनाव सिर्फ सत्ता के लिए होते रहेंगे, तब तक “बंगाल अस्मिता” भाषणों और पोस्टरों में ही जिंदा रहेगी।

और जिस दिन बंगाल अपनी अस्मिता के लिए वोट देगा, उस दिन राजनीति नहीं, इतिहास बदलेगा।

LKSTV ki website के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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“सना खान” ——  दिल्ली; ब्यूरो चीफ!

 

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