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मुंबई बीएमसी चुनावों में जीत के बाद पूरी तरह खुश क्यों नहीं है बीजेपी? विपक्ष का कौन सा दांव पड़ा भारी

मुंबई बीएमसी चुनावों में जीत के बाद पूरी तरह खुश क्यों नहीं है बीजेपी? विपक्ष का कौन सा दांव पड़ा भारी। 

मुंबई बीएमसी चुनावों में जीत के बाद पूरी तरह खुश क्यों नहीं है बीजेपी? विपक्ष का कौन सा दांव पड़ा भारी

Mumbai BMC Election Results: मुंबई बीएमसी चुनावों में बीजेपी ने अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। पार्टी ने देवेंद्र फडणवीस, रवींद्र चव्हाण और अमीत साटम की अगुवाई में 89 सीटें जीती हैं। बीजेपी को चुनावों में सर्वाधिक 45 फीसदी वोट भी मिले लेकिन पार्टी चुनाव नतीजों से पूरी तरह खुश नहीं है।

मुंबई: महाराष्ट्र में मुंबई बीजेपी-शिवसेना (महायुति) की जीत के बाद अब मेयर पर चर्चा छिड़ी है। राज्य सरकार ने मुंबई समेत 29 महानगरपालिकाओं के मेयर का आरक्षण 22 जनवरी को तय करने का फैसला किया है। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में होटल पॉलिटिक्स के साथ जुबानी वार-पलटवार का सिससिला जारी रहेगा। मुंबई में बीजेपी जरूर शिंदे के सहयोग से अपना मेयर बनाने की स्थिति में हैं लेकिन चुनाव नतीजों से पार्टी पूरी तरह से खुश नहीं है। पार्टी के अंदरखाने इस पर चर्चा भी हो रही है कि आखिर कहां पर कमी रह गई? चर्चा है कि इस बार सरकार बीएमसी में मनोनीत पार्षदों की संख्या बढ़ा सकती है। अब देखना है कि बीएमसी में पहली सरकार बनाने के लिए किन समीकरणों को साधती है? सोमवार को महाराष्ट्र बीजेपी अध्यक्ष और मुंबई बीजेपी चीफ समेत सभी नेता दिल्ली में थे। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने उनका मुंह भी मीठा कराया लेकिन चेहरे पर अपने दम बहुमत वाली खुशी नहीं थी।

बीएमसी में 114 है बहुमत का आंकड़ा

ऐसा नहीं है कि बीजेपी का प्रदर्शन कमजोर रहा। बीजेपी ने 2002 बीएमसी चुनावों में सर्वाधिक सीटें जीती हैं, हालांकि इसके बाद पार्टी को जीत में थोड़ी मासूस है कि वह 110 सीटों के आंकड़े से इतना पीछे कैसे रह गई। बीएमसी में बहुमत का आंकड़ा 114 सीटों का है। बीजेपी भले ही बड़ी पार्टी है लेकिन उसे बैसाखी यानी समर्थन की जरूरत है। साेमवार को इस बात का उल्लेख संजय राउत ने भी किया कि पीएम मोदी बीजेपी का मेयर चाहते हैं लेकिन कैसे? या तो शिंदे समर्थन दें या फिर उद्धव ठाकरे सपोर्ट करें। बीजेपी और शिंदे की तरफ से मेयर को लेकर पत्ते नहीं खोले जा रहे हैं। दोनों तरफ से कहा जा रहा कि मेयर महायुति का होगा और हिंदू मराठी होगा। मुंबई समेत महाराष्ट्र में चुनावी अभियान की अगुवाई वाली देवेंद्र फडणवीस, रवींद्र चव्हाण और अमीत साटम के हाथों में थीं। इन नेताओं के अलावा गिरीश महाजन और चंद्रशेखकर बावनकुले भी रणनीतिकारों में शामिल थे। पुणे के मोर्चे पर पार्टी ने मुरलीधर मोहोल को लगाया था।

बीजेपी ने बीच में बदला था टारगेट

बीजेपी ने ‘मिशन मुंबई’ के तहत बीएमसी की आधी सीटें जीतने का प्लान बनाया था। पार्टी ने 2017 के चुनावों में 82 सीटें जीती थीं। बीएमसी चुनावों में उतरने से पहले उसने दूसरे दलों के 11 पार्षदों को जोड़ा था। इसमें तेजस्वी घोसालकर और राखी जाधव जैसे नाम शामिल थे। जिन्होंने अंतिम वक्त पर बीजेपी का कमल थामा था। ऐसे में बीजेपी का कुल संख्याबल बढ़कर 93 तक पहुंच गई थी लेकिन बीजेपी 89 सीटों पर सिमट गई। बीजेपी ने पहले योजना 150 सीटों पर लड़ने की बनाई थी, लेकिन बाद में उसे केंद्रीय नेतृत्व के कहने पर शिंदे को ज्यादा सीटें देनी पड़ी थीं।

क्यों लक्ष्य से चूक गई बीजेपी?

छोटे से लेकर बड़े चुनावों को बेहद गंभीरता से लेकर माइक्रोप्लानिंग के बाद उतरने वाली बीजेपी कहां चूक गई? इसको लेकर कुछ कारण जिम्मेदार माने जा रहे हैं। इनमें उम्मीदवारों के चयन में गलतियां, मुंबई बीजेपी में तालमेल की कमी, चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में ठाकरे ब्रदर्स का मराठी अस्मिता का नैरेटिव शामिल हैं। पार्टी सीधे तौर पर नहीं स्वीकार कर रही है लेकिन ठाकरे ब्रदर्स ने के. अन्नमलाई के बयान से मराठी वोटों का धुवीक्ररण किया, हालांकि दूसरी तरफ दक्षिण के वोट बीजेपी के पक्ष में लामबंद हुए। लाेकसभा चुनावों में भी बीजेपी मुंबई में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई थी।

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