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कभी दीवार हिलती है. कभी दर काँप जाता है. ” अली” का नाम सुनकर अब भी ख़ैबर काँप जाता है।

“कभी दीवार हिलती है कभी दर काँप जाता है”

“अली” का नाम सुनकर अब भी खैबर काँप जाता है।

आइये आज यौमे-फतह-ख़ैबर के हवाले से बात करते हैं!

ज्यादातर हम सिर्फ़ इतना ही जानते हैं की ख़ैबर की जंग हुई थी , लेकिन जंग क्यों हुई वज़ह क्या थी ? हम ये नही जानते हैं,

आपके सामने बेमिस्ल शुजाअत की तारीख battle of khaibar की documentary पेश करता हूँ ,

खैबर मदीना मुनव्वरा से लगभग 150 किलोमीटर उत्तर की तरफ़ है

यह एक ऐसा इलाक़ा था जहाँ उस दौर में क़िलों (Fortresses) की बड़ी संख्या थी , आज उनके कुछ खंडरात बाक़ी हैं वो यहूद क़बीलों की बड़ी बस्तियाँ थीं

जंग-ए-खैबर क्यों हुई? कारण क्या थे?

जंग-ए-खैबर के सबसे बड़े कारण ये थे …. उनकी मुस्लिम विरोधी साज़िशें और गठजोड़

खैबर के यहूद क़बीले

बनी नज़ीर

बनी कुरैज़ा

बनी कैनुक़ा

इनमें से कुछ क़बीलों को मदीना से निकाल दिया गया था क्योंकि उन्होंने बार-बार मदीने में (षड्यंत्र)साज़िशें कीं मुनाफ़िक़ों के साथ मिलकर , रसूल अल्लाह के ख़िलाफ़ प्लान बनाए और कुफ़्फ़ार-ए-कुरैश को मुस्लिमों के खिलाफ उकसाया

ग़ज़वा-ए-अहज़ाब (खंदक)के दौरान खैबर के यहूद ने मक्का के कुरैश ,ग़त़फ़ान क़बीला और दूसरे क़बीलों को मुसलमानों पर हमला करने के लिए जमा किया था। यानी खैबर साज़िश का केंद्र बना हुआ था।

मदीना की सुरक्षा का मसला था

मदीना के आसपास दो इलाक़े थे-खैबर (उत्तर) मक्का (दक्षिण) कुरैश दक्षिण से खतरा थे और यहूद उत्तर से थे ।इसलिए खैबर की तरफ़ से सुरक्षा ज़्यादा ज़रूरी थी

क्योंकि खैबर के यहूद अक्सर मदीना की जमीनों पर छापे मारते क़त्ल और लूट-पाट करते लोगों को भड़काते षड्यंत्र करते और यही कारण उनसे सीधी जंग की वजह बन गया।

रसूल अल्लाह 1600 से ज़्यादा अपने असहाब को ले कर खैबर की तरफ़ कूच किया जब यहूद क़बीलो को ये ख़बर मिली तो वो अपने मज़बूत क़िलों में बंद हो गए , खैबर में 8 से 10 बड़े क़िले थे हर क़िला मजबूत, ऊँचा और हथियारों से लैस था इसलिए वहाँ ये लड़ाई हफ्तों तक चली और फ़तह हाथ नही आ रही थी

कभी आवारा-ओ-बे-ख़ान’माँ इश्क़

कभी शाहे शहाँ नौशेरवां इश्क़

कभी मैदां में आता है ज़रहपोश

कभी उरयान-ओ-बेतेग़-ओ-सिनाँ इश्क़

कभी तन्हाई-ए-कोहो दमन इश्क़

कभी सोज़-ओ-सुरूर-ओ-अंजुमन इश्क़

कभी सरमाया-ओ-महराब-ओ-मिम्बर

कभी मौला अली ख़ैबर शिकन इश्क़!

फिर आक़ा व मौला नबी करीम (सल्लालाहु अलैही वा आलैही वसल्लम) ने फ़रमाया-

“कल मैं ऐसे शख़्स के हाथ में झंडा (अलम) दूँगा,जिसके हाथों अल्लाह फ़त्ह़ देगा, वह अल्लाह और उसके रसूल से मोहब्बत करता है और अल्लाह और उसका रसूल उससे मोहब्बत करते हैं।”

सारी रात बहुत से रसूल अल्लाह के असहाब फ़िक्र में थे कल झंडा किसे मिलेगा कौन होगा वो? और अगले दिन

शेरे खुदा , हैदर-ए-क़र्रार , हज़रत अली अल मुर्तज़ा को झंडा दिया गया।

सही मुस्लिम हदीस 6222 पर ये हदीस मौजूद है 👆

खैबर के सबसे मशहूर और सबसे मज़बूत क़िला क़मूस के सामने झंडा हज़रत अली को दिया गया और अल्लाह ने उसी दिन फ़तह नसीब फ़रमाई “हैदर-ए-क़र्रार ने दरे ख़ैबर उखाड़ फैका”

“शाह-ए-मरदान, शेर-ए-यज़दान, क़ुव्वत-ए-परवरदिगार ला फ़ता इल्ला अली, ला सैफ़ इल्ला ज़ुल्फ़िकार”

शाह-ए-मरदान = बहादुरों के बादशाह

शेर-ए-यज़दान = अल्लाह का शेर

क़ुव्वत-ए-परवरदिगार = अल्लाह की दी हुई ताक़त

ला फ़ता इल्ला अली = अली के बराबर कोई बहादुर नहीं

ला सैफ़ इल्ला ज़ुल्फ़िकार = ज़ुल्फ़िकार जैसी कोई तलवार नहीं

 

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